श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 102: कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.102.17 
जगत्युपशमं याते नष्टयज्ञोत्सवक्रिये।
आजग्मु: परमामार्तिं त्रिदशा मनुजेश्वर॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! जब यज्ञ आदि कर्म नष्ट हो जाने से संसार का नाश होने लगा, तब देवताओं को बड़ी पीड़ा हुई॥17॥
 
O Lord! When the world began to get destroyed after the sacrificial ceremonies etc. were ruined, the gods felt great pain. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)