श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 102: कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.102.13 
एवं संक्षीयमाणाश्च मानवा मनुजेश्वर।
आत्मत्राणपराभीता: प्राद्रवन्त दिशो भयात्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! इस प्रकार दिन-प्रतिदिन नष्ट होते हुए मनुष्य भयभीत होकर अपनी रक्षा के लिए चारों दिशाओं में भाग गए॥13॥
 
O Lord of men! The human beings who were getting destroyed day by day in this manner, became frightened and ran away in all four directions to save themselves. ॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)