श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 102: कालेयोंद्वारा तपस्वियों, मुनियों और ब्रह्मचारियों आदिका संहार तथा देवताओंद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.102.11 
कलशैर्विप्रविद्धैश्च स्रुवैर्भग्नैस्तथैव च।
विकीर्णैरग्निहोत्रैश्च भूर्बभूव समावृता॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उन आश्रमों की भूमि उलटे हुए घड़ों, टूटे हुए डंडों और बिखरी हुई अग्निहोत्र सामग्री से ढकी हुई थी ॥11॥
 
The ground of those ashrams was covered with overturned pitchers, broken poles and scattered Agnihotra materials. ॥11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)