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mahabharat 3.101.16: महादैत्य वृत्र के मारे जाने पर भी इन्द्र भय से पीड़ित होकर (छिपने की इच्छा से) तालाब में घुस गए। भय के कारण उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उनके हाथ से वज्र छूट गया है और वृत्रासुर भी मारा गया है।॥16॥   |   mahabharat अध्याय 3.101: वृत्रासुरका वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 101: वृत्रासुरका वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणा  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.101.16 
तस्मिन् हते दैत्यवरे भयार्त:
शक्र: प्रदुद्राव सर: प्रवेष्टुम्।
वज्रं स मेने न कराद् विमुक्तं
वृत्रं भयाच्चापि हतं न मेने॥ १६॥
 
 
अनुवाद
महादैत्य वृत्र के मारे जाने पर भी इन्द्र भय से पीड़ित होकर (छिपने की इच्छा से) तालाब में घुस गए। भय के कारण उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उनके हाथ से वज्र छूट गया है और वृत्रासुर भी मारा गया है।॥16॥
 
Even after the great demon Vritra was killed, Indra was afflicted with fear and ran to enter the pond (desiring to hide). Due to his fear, he could not believe that the thunderbolt had left his hand and that Vritrasur had also been killed.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)