श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 100: वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.100.25 
ततो हतारि: सगण: सुखं वै
प्रशाधि कृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठ:।
त्वष्ट्रा तथोक्तस्तु पुरंदरस्तद्
वज्रं प्रहृष्ट: प्रयतो ह्यगृह्णात्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
‘इस प्रकार शत्रु के मारे जाने पर तुम देवताओं के साथ स्वर्ग में रहकर सुखपूर्वक सम्पूर्ण स्वर्ग का शासन और पालन करो।’ त्वष्टा प्रजापति के ऐसा कहने पर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हुए और शुद्ध मन से उनके हाथ से वज्र ले लिया॥ 25॥
 
'After the enemy is killed in this way, you should live in heaven with the gods and happily rule and look after the entire heaven.' Indra was very pleased when Tvashta Prajapati said this. With a pure mind, he took the thunderbolt from his hand.॥ 25॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वज्रनिर्माणकथने शततमोऽध्याय:॥ १००॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें वज्रनिर्माणकथनविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १००॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)