प्रहृष्टरूपाश्च जयाय देवा-
स्त्वष्टारमागम्य तमर्थमूचु:।
त्वष्टा तु तेषां वचनं निशम्य
प्रहृष्टरूप: प्रयत: प्रयत्नात्॥ २३॥
चकार वज्रं भृशमुग्ररूपं
कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्ट:।
अनेन वज्रप्रवरेण देव
भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम्॥ २४॥
अनुवाद
इसके बाद वे विजय की आशा से त्वष्टा प्रजापति के पास पहुँचे और उनसे अपना उद्देश्य कहा। देवताओं की बात सुनकर त्वष्टा प्रजापति अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने मन को एकाग्र करके बड़े यत्न से एक अत्यंत भयंकर वज्र का निर्माण किया। तत्पश्चात उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक इन्द्र से कहा - 'भगवन! आप इस उत्तम वज्र से आज ही देवताओं के भयंकर शत्रु वृत्रासुर का नाश कर दीजिए।'
After this, they came to Tvashta Prajapati with the hope of victory and told him their purpose. Tvashta Prajapati was very happy after listening to the words of the gods. He concentrated his mind and with great effort he created a very fearsome thunderbolt. After that, he said to Indra with joy - 'God! With this excellent thunderbolt, you should destroy the fearsome enemy of the gods, Vritrasura, today itself.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)