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mahabharat 3.100.21: तब महर्षि दधीच अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन श्रेष्ठ देवताओं से इस प्रकार बोले - 'देवताओं! आज मैं वह कार्य करूँगा, जिससे आप सबका कल्याण होगा। मैं स्वयं ही अपना यह शरीर त्याग दूँगा।'   |   mahabharat अध्याय 3.100: वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 100: वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.100.21 
ततो दधीच: परमप्रतीत:
सुरोत्तमांस्तानिदमभ्युवाच।
करोमि यद् वो हितमद्य देवा:
स्वं चापि देहं स्वयमुत्सृजामि॥ २१॥
 
 
अनुवाद
तब महर्षि दधीच अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन श्रेष्ठ देवताओं से इस प्रकार बोले - 'देवताओं! आज मैं वह कार्य करूँगा, जिससे आप सबका कल्याण होगा। मैं स्वयं ही अपना यह शरीर त्याग दूँगा।'
 
Then Maharishi Dadhicha became very happy and said to those great gods in this way - 'Gods! Today I will do that which will be beneficial for you all. I myself will give up this body of mine.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)