श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 100: वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.100.16 
करेणुभिर्वारणैश्च प्रभिन्नकरटामुखै:।
सरोऽवगाढै: क्रीडद्भि: समन्तादनुनादितम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
अमृत ​​से टपकते गालों वाले हाथी और हथिनियाँ सरोवर के जल में डुबकी लगाकर वहाँ क्रीड़ा कर रहे थे, जिससे आश्रम में चारों ओर बड़ा शोर हो रहा था॥16॥
 
The elephants and female elephants, with their cheeks dripping with nectar, were taking a dip in the water of the lake and playing there, due to which there was a lot of noise all around the ashram.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)