|
| |
| |
श्लोक 3.10.39  |
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा मैत्रेय: प्रातिष्ठत यथाऽऽगतम्।
किर्मीरवधसंविग्नो बहिर्दुर्योधनो ययौ॥ ३९॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं - हे राजन! ऐसा कहकर मैत्रेय जिस मार्ग से आये थे, उसी मार्ग से चले गये। किर्मीर की मृत्यु का समाचार सुनकर दुर्योधन भी व्याकुल होकर बाहर चला गया। |
| |
| Vaishmpayana says - O King! Having said this, Maitreya left the same way he had come. Hearing the news of Kirmir's death, Duryodhan too went out in a state of agitation. |
| |
इ ति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि मैत्रेयशापे दशमोऽध्याय:॥ १०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें मैत्रेयशापविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|