श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 10: व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.10.36 
मैत्रेय उवाच
शमं यास्यति चेत् पुत्रस्तव राजन् यदा तदा।
शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेयजी बोले, "हे राजन! जब आपका पुत्र शांति धारण कर लेगा (पांडवों से शत्रुता छोड़कर उनसे संधि कर लेगा), तब यह शाप उस पर लागू नहीं होगा। पिताश्री! यदि वह इसके विपरीत आचरण करेगा तो उसे अवश्य ही यह शाप भोगना पड़ेगा।"
 
Maitreya said, "O King! When your son adopts peace (stops enmity with the Pandavas and makes peace with them), then this curse will not apply to him. Father! If he behaves contrary to this then he will surely have to suffer this curse." 36.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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