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mahabharat 3.10.28-29: वैशम्पायन कहते हैं - हे राजन! जब मैत्रेयजी ऐसा कह रहे थे, तब दुर्योधन ने मुस्कुराकर अपने हाथी की सूंड के समान हाथ से उनकी जाँघ पर प्रहार किया और पैरों से पृथ्वी को कुरेदने लगा।   |   mahabharat अध्याय 3.10: व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 10: व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  3.10.28-29 
वैशम्पायन उवाच
एवं तु ब्रुवतस्तस्य मैत्रेयस्य विशाम्पते॥ २८॥
ऊरुं गजकराकारं करेणाभिजघान स:।
दुर्योधन: स्मितं कृत्वा चरणेनोल्लिखन् महीम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - हे राजन! जब मैत्रेयजी ऐसा कह रहे थे, तब दुर्योधन ने मुस्कुराकर अपने हाथी की सूंड के समान हाथ से उनकी जाँघ पर प्रहार किया और पैरों से पृथ्वी को कुरेदने लगा।
 
Vaishmpayana says - O King! When Maitreya was saying this, Duryodhan smiled and hit his thigh with his hand which was like an elephant's trunk and started scraping the earth with his feet.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)