vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 10: व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना
»
श्लोक 17
श्लोक
3.10.17
दस्यूनामिव यद् वृत्तं सभायां कुरुनन्दन।
तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे॥ १७॥
अनुवाद
हे कुरुपुत्र! तुम्हारे साथ दरबार में जिस प्रकार लुटेरों जैसा व्यवहार किया गया है, उससे तुम तपस्वी मुनियों की संगति में शोभा नहीं पाते हो॥17॥
O son of Kuru! Because of the way you have been treated like robbers in your court, you do not look good in the company of ascetic sages. ॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×