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mahabharat 3.10.17: हे कुरुपुत्र! तुम्हारे साथ दरबार में जिस प्रकार लुटेरों जैसा व्यवहार किया गया है, उससे तुम तपस्वी मुनियों की संगति में शोभा नहीं पाते हो॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.10: व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 10: व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.10.17 
दस्यूनामिव यद् वृत्तं सभायां कुरुनन्दन।
तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुपुत्र! तुम्हारे साथ दरबार में जिस प्रकार लुटेरों जैसा व्यवहार किया गया है, उससे तुम तपस्वी मुनियों की संगति में शोभा नहीं पाते हो॥17॥
 
O son of Kuru! Because of the way you have been treated like robbers in your court, you do not look good in the company of ascetic sages. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)