श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 10: व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.10.16 
मेढीभूत: स्वयं राजन्निग्रहे प्रग्रहे भवान्।
किमर्थमनयं घोरमुत्पद्यन्तमुपेक्षसे॥ १६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! आप स्वयं ही उन सबको बाँधकर रखने वाले तथा वश में रखने वाले स्तम्भ के समान हैं; फिर आप इस घोर अन्याय को जो हो रहा है, क्यों अनदेखा कर रहे हैं?॥16॥
 
Maharaj! You yourself are like a pillar to keep them all tied up and under control; then why are you ignoring this grave injustice that was being done? ॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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