श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.1.46 
राजानं तु कुरुश्रेष्ठं ते हंसमधुरस्वरा:।
आश्वासयन्तो विप्राग्रॺा: क्षपां सर्वां व्यनोदयन्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
वे श्रेष्ठ ब्राह्मण हंसों के समान मधुर वाणी बोलते हुए कुरुवंश के रत्न राजा युधिष्ठिर का रात्रि भर सत्कार करते रहे और उन्हें शान्ति देते रहे ॥ 46॥
 
Those excellent Brahmins, speaking in voices as sweet as that of swans, entertained King Yudhishthira, the jewel of the Kuru clan, all night, reassuring him. ॥ 46॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पौरप्रत्यागमने प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें पुरवासियोंके लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)