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mahabharat 3.1.42: जैसे ही शाम होने लगी, वीर पांडव बरगद के पेड़ के पास पहुंचे, पवित्र जल को छुआ (जल पीने और शाम की प्रार्थना करने के बाद), और वहीं रात बिताई।   |   mahabharat अध्याय 3.1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.1.42 
ते तं दिवसशेषेण वटं गत्वा तु पाण्डवा:।
ऊषुस्तां रजनीं वीरा: संस्पृश्य सलिलं शुचि॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही शाम होने लगी, वीर पांडव बरगद के पेड़ के पास पहुंचे, पवित्र जल को छुआ (जल पीने और शाम की प्रार्थना करने के बाद), और वहीं रात बिताई।
 
As the evening approached, the valiant Pandavas reached the banyan tree, touched the holy water (after sipping the water and performing evening prayers), and spent the night there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)