श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.1.40 
गुणान् पार्थस्य संस्मृत्य दु:खार्ता: परमातुरा:।
अकामा: संन्यवर्तन्त समागम्याथ पाण्डवान्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर के गुणों का स्मरण करके प्रजा शोकग्रस्त और अत्यन्त चिन्ताग्रस्त हो गई। पाण्डवों के साथ जाने की उनकी इच्छा पूरी न हो सकी। वे उनसे मिलकर ही लौट आए ॥40॥
 
Remembering the virtues of Kunti's son Yudhishthira, the people became grief stricken and extremely anxious. His wish to go with the Pandavas could not be fulfilled. He returned only after meeting them. 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)