श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.1.38 
एतद्धि मम कार्याणां परमं हृदि संस्थितम्।
कृता तेन तु तुष्टिर्मे सत्कारश्च भविष्यति॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
मेरे हृदय में जितने भी कार्य हैं, उनमें यह सबसे उत्तम कार्य है। यदि तुम इसे करोगे तो मुझे अपार संतोष मिलेगा और इससे मेरा सम्मान भी होगा ॥38॥
 
Of all the tasks that are in my heart, this is the best task. If you do this, I will get immense satisfaction and I will also be honored by this. ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)