Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.1.37: अच्छा, अब लौट जाओ, तुम बहुत दूर आ गए हो। मैं अपनी शपथ लेकर तुमसे विनती करता हूँ कि तुम मेरे साथ मत चलो। मेरे सम्बन्धी तुम्हारे साथ धरोहर के रूप में हैं। उनके प्रति तुम्हारे हृदय में स्नेह होना चाहिए॥ 37॥ | mahabharat अध्याय 3.1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
निवर्ततागता दूरं समागमनशापिता:।
स्वजने न्यासभूते मे कार्या स्नेहान्विता मति:॥ ३७॥
अनुवाद
अच्छा, अब लौट जाओ, तुम बहुत दूर आ गए हो। मैं अपनी शपथ लेकर तुमसे विनती करता हूँ कि तुम मेरे साथ मत चलो। मेरे सम्बन्धी तुम्हारे साथ धरोहर के रूप में हैं। उनके प्रति तुम्हारे हृदय में स्नेह होना चाहिए॥ 37॥
Well, now go back, you have come a long way. I request you with my oath that you should not come with me. My relatives are with you as a heritage. You should have affection for them in your hearts.॥ 37॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥