श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.1.33 
युधिष्ठिर उवाच
धन्या वयं यदस्माकं स्नेहकारुण्ययन्त्रिता:।
असतोऽपि गुणानाहुर्ब्राह्मणप्रमुखा: प्रजा:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा, "हम बहुत धन्य हैं क्योंकि ब्राह्मण आदि लोग हमारे प्रति प्रेम और करुणा के कारण हमें उन गुणों के बारे में बता रहे हैं जो हमारे पास नहीं हैं।"
 
Yudhishthira said, "We are very blessed because people like Brahmins etc., out of love and compassion for us, are telling us about the qualities that we do not possess."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)