श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  3.1.27-28 
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च।
ते सेव्यास्तै: समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी॥ २७॥
निरारम्भा ह्यपि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु।
पुण्यमेवाप्नुयामेह पापं पापोपसेवनात्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जिनका ज्ञान, जाति और कर्म सभी श्रेष्ठ हों, उनकी संगति करनी चाहिए; क्योंकि ऐसे महापुरुषों की संगति शास्त्र-अध्ययन से भी श्रेष्ठ है। यदि हम अग्निहोत्र आदि शुभ कर्म न भी करें, तो भी पुण्यात्मा महात्माओं की संगति से हमें पुण्य की प्राप्ति होगी। इसी प्रकार पापी मनुष्यों की संगति से हमें पाप ही प्राप्त होंगे॥ 27-28॥
 
‘People whose knowledge, caste and deeds are all illustrious should be kept company with; because sitting in the company of such great men is better than studying the scriptures. Even if we do not perform auspicious deeds like Agnihotra etc., we will still get virtues by staying in the company of virtuous saints. Similarly, by keeping company with sinful people we will only incur sins.॥ 27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)