श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.1.25 
मोहजालस्य योनिर्हि मूढैरेव समागम:।
अहन्यहनि धर्मस्य योनि: साधुसमागम:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'मूर्ख लोगों के साथ रहने से माया जाल की रचना होती है। उसी प्रकार प्रतिदिन साधु-संतों की संगति करने से धर्म की प्राप्ति होती है।॥ 25॥
 
'Meeting with foolish people leads to the creation of a web of illusion. Similarly, associating with saints and sages daily helps one attain Dharma.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)