श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.1.23 
श्रूयतां चाभिधास्यामो गुणदोषान्नरर्षभा:।
शुभाशुभाधिवासेन संसर्ग: कुरुते यथा॥ २३॥
 
 
अनुवाद
'श्रेष्ठ पाण्डवों! शुभ और अशुभ आश्रय के संसर्ग से मनुष्य में जो गुण और दोष उत्पन्न होते हैं, उनका वर्णन हम करते हैं, सुनो॥ 23॥
 
'The best Pandavas! Listen, we describe the qualities and defects that the contact with auspicious and inauspicious shelter creates in a person. 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)