श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  3.1.21-22 
अधर्मेण जितान् श्रुत्वा युष्मांस्त्यक्तघृणै: परै:।
उद्विग्ना: स्मो भृशं सर्वे नास्मान् हातुमिहार्हथ॥ २१॥
भक्तानुरक्तान् सुहृद: सदा प्रियहिते रतान्।
कुराजाधिष्ठिते राज्ये न विनश्येम सर्वश:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'यह सुनकर हम सब बहुत दुःखी हैं कि आपके क्रूर शत्रुओं ने आपको अन्यायपूर्ण जुए में हरा दिया है। कृपया हमें त्याग न दें; क्योंकि हम आपके सेवक, आपके प्रेमी, आपके मित्र हैं और सदैव आपके हित में तत्पर रहते हैं। हम इस दुष्ट राजा के राज्य में आपके बिना नष्ट नहीं होना चाहते।॥ 21-22॥
 
'We are all very distressed to hear that your ruthless enemies have defeated you in unjust gambling. Please do not abandon us; because we are your servants, your lovers, your friends and are always devoted to your welfare. We do not want to perish without you in the kingdom of this evil king.॥ 21-22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)