श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.1.16 
दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्ताचारसुहृज्जन:।
अर्थलुब्धोऽभिमानी च नीच: प्रकृतिनिर्घृण:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन अपने बड़ों से द्वेष रखता है। उसने सदाचार और पाण्डवों जैसे मित्रों को त्याग दिया है। वह स्वभाव से ही लोभी, अभिमानी, नीच और क्रूर है॥16॥
 
Duryodhan hates his elders. He has abandoned good conduct and friends like the Pandavas. He is greedy, arrogant, mean and cruel by nature.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)