श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.1.15 
न तत् कुलं न चाचारो न धर्मोऽर्थ: कुत: सुखम्।
यत्र पापसहायोऽयं पापो राज्यं चिकीर्षति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जहाँ यह पापी पापियों की सहायता से राज्य करना चाहता है, वहाँ हमारा कुल, आचरण, धर्म और धन टिक नहीं सकते; फिर वहाँ सुख कैसे हो सकता है? ॥15॥
 
Where this sinner wants to rule with the help of sinners, our family, conduct, religion and wealth cannot survive; then how can there be any happiness? ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)