श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 1: पाण्डवोंका वनगमन, पुरवासियोंद्वारा उनका अनुगमन और युधिष्ठिरके अनुरोध करनेपर उनमेंसे बहुतोंका लौटना तथा पाण्डवोंका प्रमाणकोटितीर्थमें रात्रिवास  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.1.1-2 
जनमेजय उवाच
एवं द्यूतजिता: पार्था: कोपिताश्च दुरात्मभि:।
धार्तराष्ट्रै: सहामात्यैर्निकृत्या द्विजसत्तम॥ १॥
श्राविता: परुषा वाच: सृजद्भिर्वैरमुत्तमम्।
किमकुर्वत कौरव्या मम पूर्वपितामहा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन्! जब दुष्ट बुद्धि वाले धृतराष्ट्र के पुत्रों ने अपने मन्त्रियों सहित कुन्तीकुमारों को छलपूर्वक जुए में हराकर उन्हें कुपित किया और उनसे अत्यन्त कटु वचन कहकर घोर शत्रुता की नींव डाली, तब मेरे पूर्वज युधिष्ठिर आदि कुरुवंशियों ने क्या किया?॥1-2॥
 
Janamejaya asked - Brahmin! When the evil-minded sons of Dhritarashtra, along with their ministers, defeated Kuntikumar in gambling in a deceitful manner and enraged them and laid the foundation of deep enmity by speaking very harsh words to them, then what did my forefathers Yudhishthira and other Kuru dynasty members do?॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)