श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 89: धृतराष्ट्रकी चिन्ता और उनका संजयके साथ वार्तालाप  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  2.89.38-39 
एवं कृते महाराज परं श्रेयस्त्वमाप्स्यसि।
एवं गावल्गणे क्षत्ता धर्मार्थसहितं वच:॥ ३८॥
उक्तवान् न गृहीतं वै मया पुत्रहितैषिणा॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
‘महाराज! ऐसा करने से आपको परम कल्याण की प्राप्ति होगी।’ संजय! इस प्रकार विदुर ने मुझसे धर्म और अर्थ की बातें कही थीं; परंतु पुत्र का हितैषी होने के कारण मैंने उनकी बात नहीं मानी।
 
'Maharaj! By doing this you will attain supreme welfare.' Sanjay! In this way Vidur had spoken to me about Dharma and meaning; but being a well wisher of my son, I did not listen to him.
 
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रॺां संहितायां वैयासिक्यां सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि धृतराष्ट्रसंजयसंवादे एकाशीतितमोऽध्याय:॥ ८१॥
इस प्रकार व्यासनिर्मित श्रीमहाभारतनामक एक लाख श्लोकोंकी संहितामें सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें धृतराष्ट्रसंजयसंवादविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८१॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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