श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक d5-d6
 
 
श्लोक  2.88.d5-d6 
सर्वे चासन् निरुत्साहा व्याधिना बाधिता यथा॥
पार्थान् प्रति नरा नित्यं चिन्ताशोकपरायणा:।
तत्र तत्र कथां चक्रु: समासाद्य परस्परम्॥
 
 
अनुवाद
कुंतीपुत्रों की निरंतर चिंता और शोक के कारण सभी का उत्साह समाप्त हो गया था। सबकी हालत रोगी के समान हो गई थी। सभी एक-दूसरे से मिलते और जहाँ-तहाँ पांडवों की ही चर्चा करते थे।
 
Everyone had lost their enthusiasm due to constant worry and grief for the sons of Kunti. Everyone's condition had become like that of a sick person. Everyone used to meet each other and talk about the Pandavas everywhere.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)