श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.88.8 
धौम्यो रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशाम्पते।
गायन् गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना॥ ८॥
 
 
अनुवाद
महाराज! पुरोहित धौम्यजी हाथ में कुशा लिये हुए रुद्र और यमदेवता से सम्बन्धित साम-मन्त्रों का जप करते हुए मार्ग में आगे-आगे चल रहे थे।
 
Maharaj! The priest Dhoumyaji, holding a kusha in his hand, was walking ahead on the road, chanting the Sama-mantras related to Rudra and Yamadevata.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)