श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  2.88.52 
सम्यगाह गुरु: क्षत्तरुपावर्तय पाण्डवान्।
यदि ते न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवा:।
सशस्त्ररथपादाता भोगवन्तश्च पुत्रका:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
विदुर! गुरु द्रोणाचार्य ने ठीक ही कहा है। तुम पाण्डवों को वापस ले आओ। यदि वे न लौटें, तो उन्हें रथियों और पैदल सेना द्वारा सुरक्षित, शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सुख-सुविधाओं से युक्त, आदरपूर्वक वन में भ्रमण के लिए ले जाओ; क्योंकि वे भी मेरे ही पुत्र हैं।॥ 52॥
 
‘Vidur! Guru Dronacharya has said the right thing. You should bring back the Pandavas. If they do not return, then they should go for a tour of the forest with respect, protected by charioteers and infantry equipped with weapons and full of luxuries; because they are also my sons.'॥ 52॥
 
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि विदुरधृतराष्ट्रद्रोणवाक्ये अशीतितमोऽध्याय:॥ ८०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें विदुर, धृतराष्ट्र और द्रोणके वचनविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८०॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)