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mahabharat 2.88.45: उसके शरीर की कांति अग्नि की ज्वाला के समान चमक रही है। वह देवताओं का दिया हुआ पुत्र है और धनुष, बाण और कवच धारण किए हुए प्रकट हुआ है। मैं अब उससे मरणधर्मा मनुष्य होने के कारण अत्यन्त भयभीत हूँ ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 2.88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.88.45 
ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान् कवची शरी।
मर्त्यधर्मतया तस्मादद्य मे साध्वसो महान्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
उसके शरीर की कांति अग्नि की ज्वाला के समान चमक रही है। वह देवताओं का दिया हुआ पुत्र है और धनुष, बाण और कवच धारण किए हुए प्रकट हुआ है। मैं अब उससे मरणधर्मा मनुष्य होने के कारण अत्यन्त भयभीत हूँ ॥ 45॥
 
‘The radiance of his body shines like the flame of fire. He is a son given by the gods and has appeared with a bow, arrow and armour. Being a mortal man, I am now very afraid of him. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)