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mahabharat 2.88.44: 'धृषद्युम्न रिश्ते की दृष्टि से कुंती के पुत्रों के साले हैं, इसलिए वे सदैव उन्हें प्रसन्न करने में लगे रहते हैं, उन्हीं के कारण मुझे भय है।'   |   mahabharat अध्याय 2.88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.88.44 
धृष्टद्युम्नस्तु पार्थानां श्याल: सम्बन्धतो मत:।
पाण्डवानां प्रियरतस्तस्मान्मां भयमाविशत्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
'धृषद्युम्न रिश्ते की दृष्टि से कुंती के पुत्रों के साले हैं, इसलिए वे सदैव उन्हें प्रसन्न करने में लगे रहते हैं, उन्हीं के कारण मुझे भय है।'
 
'Dhrishadyumna is brother-in-law of Kunti's sons in terms of relation, so he is always engaged in pleasing them, it is because of him that I am afraid.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)