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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.88.43 
याजोपयाजतपसा पुत्रं लेभे स पावकात्।
धृष्टद्युम्नं द्रौपदीं च वेदीमध्यात् सुमध्यमाम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
'याज और उपयाज की तपस्या से उन्होंने अग्नि से धृष्टद्युम्न को और वेदी के मध्य से सुन्दरी द्रौपदी को प्राप्त किया।
 
‘Through the austerities of Yaj and Upyaj he obtained Dhrishtadyumna from the fire and the beautiful Draupadi from the centre of the altar.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)