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mahabharat 2.88.35: ऐसा कहकर देवर्षि प्रवर नारद, जो अपार ब्रह्मतेज से युक्त थे, आकाश में चले गए और अचानक अदृश्य हो गए।   |   mahabharat अध्याय 2.88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.88.35 
इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन्तरधीयत।
ब्राह्मीं श्रियं सुविपुलां बिभ्रद् देवर्षिसत्तम:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर देवर्षि प्रवर नारद, जो अपार ब्रह्मतेज से युक्त थे, आकाश में चले गए और अचानक अदृश्य हो गए।
 
Saying this, Devarshi Pravara Narad, who possessed the immense Brahmatej, went into the sky and suddenly disappeared.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)