श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  2.88.32-33 
वैशम्पायन उवाच
एवं प्रवदतोरेव तयोस्तत्र विशाम्पते।
धृतराष्ट्रस्य राज्ञश्च विदुरस्य च धीमत:॥ ३२॥
नारदश्च सभामध्ये कुरूणामग्रत: स्थित:।
महर्षिभि: परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'हे जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान विदुरजी आपस में इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय सभा में महात्माओं से घिरे हुए नारद मुनि आकर कौरवों के सामने खड़े हो गए और ये भयंकर वचन बोले -॥32-33॥
 
Vaishmpayana says - 'O Janamejaya! While King Dhritarashtra and the wise Vidur were thus talking to each other, at that very time the sage Narada, surrounded by the great sages in the assembly, came and stood before the Kauravas and spoke these horrifying words -॥ 32-33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)