श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.88.31 
एवमेते महोत्पाता: प्रादुरासन् दुरासदा:।
भरतानामभावाय राजन् दुर्मन्त्रिते तव॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! आपकी कुमति के कारण ही ऐसे अशुभ, अदम्य और महान् विपत्तियाँ घटित हुई हैं, जो भरतवंश के नाश का संकेत दे रही हैं।
 
O King! Due to your evil advice, such ill omens, indomitable and great calamities have occurred, which are signalling the destruction of the Bharata dynasty.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)