श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  2.88.28-29 
एवं तेषु नराग्रॺेषु निर्यत्सु गजसाह्वयात्।
अनभ्रे विद्युतश्चासन् भूमिश्च समकम्पत॥ २८॥
राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते।
उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत॥ २९॥
 
 
अनुवाद
पुरुषोत्तम पाण्डवों के हस्तिनापुर से विदा होते ही बिना बादलों के ही बिजली कड़कने लगी, पृथ्वी काँप उठी। हे राजन्! बिना पर्व (अमावस्या) के ही राहु ने सूर्य को निगल लिया था और उसके दाहिनी ओर के नगर पर एक उल्कापात हुआ था।
 
As soon as the Pandavas, the best of men, left Hastinapur, lightning started striking without clouds, the earth shook. O King! Without a festival (amavasya) Rahu had swallowed the Sun and a meteor had struck the city to its right.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)