श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.88.27 
एवमाकारलिङ्गैस्ते व्यवसायं मनोगतम्।
कथयन्तश्च कौन्तेया वनं जग्मुर्मनस्विन:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! इस प्रकार बुद्धिमान कुन्तीपुत्र अपने रूप और चिह्नों द्वारा अपने अन्तःकरण को प्रकट करते हुए वन में चले गये हैं।
 
Maharaj! In this manner the wise son of Kunti has gone to the forest, revealing his inner resolve by his form and signs. 27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)