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श्री महाभारत
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पर्व 2: सभा पर्व
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अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन
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श्लोक 18
श्लोक
2.88.18
नाहं मनांस्याददेयं मार्गे स्त्रीणामिति प्रभो।
पांसूपलिप्तसर्वाङ्गो नकुलस्तेन गच्छति॥ १८॥
अनुवाद
हे प्रभु! इस भय से कि कहीं मैं मार्ग में स्त्रियों का मन न चुरा लूँ, नकुल अपने शरीर पर धूलि लगाकर यात्रा करता है। 18.
O Lord! Fearing that I might steal the hearts of women on the way, Nakul travels by applying dust all over his body. 18.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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