श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.88.17 
न मे कश्चिद् विजानीयान्मुखमद्येति भारत।
मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवोऽपि गच्छति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
भरत! इस विपत्तिकाल में कोई मेरा मुख न पहचान ले, यह सोचकर सहदेव अपना मुख कीचड़ से सना हुआ चला जा रहा है।
 
Bharata! Thinking that no one should recognize my face in these bad times, Sahadeva is going with his face smeared with mud. 17.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)