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mahabharat 2.88.10: विदुर ने कहा, "महाराज! यद्यपि आपके पुत्रों ने छलपूर्वक आचरण किया है, पाण्डवों ने अपना राज्य और धन खो दिया है, फिर भी परम बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर की बुद्धि धर्म से विचलित नहीं हो रही है।   |   mahabharat अध्याय 2.88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.88.10 
विदुर उवाच
निकृतस्यापि ते पुत्रैर्हृते राज्ये धनेषु च।
न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमत:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
विदुर ने कहा, "महाराज! यद्यपि आपके पुत्रों ने छलपूर्वक आचरण किया है, पाण्डवों ने अपना राज्य और धन खो दिया है, फिर भी परम बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर की बुद्धि धर्म से विचलित नहीं हो रही है।
 
Vidura said, "Maharaj! Although your sons have behaved deceitfully, the Pandavas have lost their kingdom and wealth, yet the intellect of the most intelligent Dharmaraja Yudhishthira is not deviating from Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)