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mahabharat 2.87.d25: वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार युधिष्ठिर ने भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा कही गई भिन्न-भिन्न बातें सुनीं। उन्हें सुनकर भी उनके मन में कोई विक्षोभ नहीं हुआ।   |   mahabharat अध्याय 2.87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.87.d25 
वैशम्पायन उवाच
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिता:।
शुश्राव पार्थ: श्रुत्वा च न विचक्रेऽस्य मानसम्॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार युधिष्ठिर ने भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा कही गई भिन्न-भिन्न बातें सुनीं। उन्हें सुनकर भी उनके मन में कोई विक्षोभ नहीं हुआ।
 
Vaishampayana says- Janamejaya! In this way Yudhishthira heard different things said by different people. Even after listening to them, there was no disturbance in his mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)