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वैशम्पायन उवाच
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिता:।
शुश्राव पार्थ: श्रुत्वा च न विचक्रेऽस्य मानसम्॥
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! इस प्रकार युधिष्ठिर ने भिन्न-भिन्न लोगों द्वारा कही गई भिन्न-भिन्न बातें सुनीं। उन्हें सुनकर भी उनके मन में कोई विक्षोभ नहीं हुआ।
Vaishampayana says- Janamejaya! In this way Yudhishthira heard different things said by different people. Even after listening to them, there was no disturbance in his mind.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥