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श्लोक 2.87.d15-d16  |
मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मराजो महाद्युति:।
पुष्पं फलं च पत्रं च शाखास्तस्येतरे जना:॥
ते भ्रातर इव क्षिप्रं सपुत्रा: सहबान्धवा:।
गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति पाण्डव:॥ |
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| अनुवाद |
| महाबली धर्मराज युधिष्ठिर ही मनुष्यों के मूल हैं। संसार के अन्य लोग उनकी शाखाएँ, पत्ते, पुष्प और फल हैं। आज हमें अपने पुत्रों और भाइयों को साथ लेकर चारों पाण्डव भाइयों की भाँति शीघ्रता से उनके पीछे-पीछे उसी मार्ग पर चलना चाहिए जिस पर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर जा रहे हैं। |
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| The mighty Dharmaraja Yudhishthira is the root of human beings. The other people of the world are his branches, leaves, flowers and fruits. Today, taking our sons and brothers, we should follow him quickly like the four Pandava brothers on the same path on which Panduputra Yudhishthira is going. |
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