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mahabharat 2.87.d13-d14: जैसे ग्रीष्म ऋतु में जलाशय का जलस्तर कम हो जाने पर जलचर व्याकुल हो जाते हैं तथा जड़ कट जाने पर फल-फूल वाला वृक्ष सूखने लगता है, उसी प्रकार समस्त जगत के उद्धारक महाराज युधिष्ठिर की पीड़ा से सारा जगत व्याकुल हो गया है।   |   mahabharat अध्याय 2.87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक d13-d14
 
 
श्लोक  2.87.d13-d14 
औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात्॥
पीडया पीडितं सर्वं जगत् तस्य जगत्पते:।
मूलस्यैवोपघातेन वृक्ष: पुष्पफलोपग:॥
 
 
अनुवाद
जैसे ग्रीष्म ऋतु में जलाशय का जलस्तर कम हो जाने पर जलचर व्याकुल हो जाते हैं तथा जड़ कट जाने पर फल-फूल वाला वृक्ष सूखने लगता है, उसी प्रकार समस्त जगत के उद्धारक महाराज युधिष्ठिर की पीड़ा से सारा जगत व्याकुल हो गया है।
 
Just as aquatic creatures become distressed when the water level in a reservoir decreases in summer and a tree bearing fruits and flowers begins to dry up when its roots are cut off, similarly the entire world has become afflicted by the pain of Maharaja Yudhishthira, the saviour of the entire universe.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)