श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.87.9 
तथेत्युक्त्वा तु सा देवी स्रवन्नेत्रजलाविला।
शोणिताक्तैकवसना मुक्तकेशी विनिर्ययौ॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जब कुन्ती ने ऐसा कहा, तब द्रौपदी ने नेत्रों से आँसू बहाते हुए 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। उस समय उनके शरीर पर केवल एक वस्त्र था, जिसका कुछ भाग रक्त से भी सना हुआ था और उनके केश बिखरे हुए थे। उसी अवस्था में वह अंतःकक्ष से बाहर आ गईं॥9॥
 
When Kunti said this, Draupadi accepted her command saying 'Tathastu' with tears flowing from her eyes. At that time she had only one cloth on her body, some part of which was also stained with blood and her hair was scattered. In the same condition she came out of the inner chamber.॥9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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