श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.87.6 
सभाग्या: कुरवश्चेमे ये न दग्धास्त्वयानघे।
अरिष्टं व्रज पन्थानं मदनुध्यानबृंहिता॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'निर्दोष द्रौपदी! ये कौरव बड़े भाग्यशाली हैं कि तुमने इन्हें अपनी क्रोधाग्नि से भस्म नहीं किया। जाओ, तुम्हारा मार्ग निर्विघ्न हो; मेरी शुभकामनाओं से तुम्हारा कल्याण हो।'
 
‘Innocent Draupadi! These Kauravas are very fortunate that you did not burn them to ashes with the fire of your anger. Go, may your path be free from obstacles; may you prosper with my good wishes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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