श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.87.31 
विदुरश्चापि तामार्तां कुन्तीमाश्वास्य हेतुभि:।
प्रावेशयद् गृहं क्षत्ता स्वयमार्ततर: शनै:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
विदुरजी ने अनेक प्रकार के तर्कों से शोकग्रस्त कुन्ती को सांत्वना दी और धीरे-धीरे उसे अपने घर ले गए। उस समय वे स्वयं भी बहुत दुःखी थे।
 
Vidurji consoled the grief-stricken Kunti with many kinds of arguments and slowly took her to his home. He himself was also very sad at that time. 31.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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