श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.87.30 
वैशम्पायन उवाच
एवं विलपतीं कुन्तीमभिवाद्य प्रणम्य च।
पाण्डवा विगतानन्दा वनायैव प्रवव्रजु:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - शोकमग्न माता कुन्ती को नमस्कार और प्रणाम करके पाण्डव दुःखी होकर वन को चले गए ॥30॥
 
Vaishampayanji says - After greeting and paying obeisance to the mourning mother Kunti, the Pandavas became sad and went to the forest. 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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