श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.87.28 
सहदेव निवर्तस्व ननु त्वमसि मे प्रिय:।
शरीरादपि माद्रेय मा मा त्याक्षी: कुपुत्रवत्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
माद्रीनन्दन सहदेव! तुम मुझे अपने शरीर से भी अधिक प्रिय हो। पुत्र! लौट आओ। दुष्ट पुत्र की भाँति मुझे त्याग मत दो। 28॥
 
Madrinandan Sahdev! You are dearer to me than my own body. Son! Come back. Don't abandon me like an evil son. 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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