| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना » श्लोक 22 |
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| | | | श्लोक 2.87.22  | अन्तवत्यसुधर्मेऽस्मिन् धात्रा किं नु प्रमादत:।
ममान्तो नैव विहितस्तेनायुर्न जहाति माम्॥ २२॥ | | | | | | अनुवाद | | जीवन को थामे रखने का यह कर्तव्य क्षणिक है, एक दिन इसका अंत होना ही है, फिर भी न जाने क्यों विधाता ने लापरवाही में मेरे जीवन का अंत शीघ्र ही तय नहीं कर दिया। इसीलिए उम्र मेरा पीछा नहीं छोड़ रही। | | | | This duty of holding on to life is temporary, it is certain to come to an end some day, yet I don't know why the Creator, out of negligence, did not decide the end of my life soon. That is why age is not leaving me. | |
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